UPSC Climate Agreements Summary for Prelims and Mains

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UPSC Climate Agreements Summary for Prelims and Mains

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे उम्मीदवारों के लिए जलवायु समझौते (Climate Agreements) एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा दोनों में पर्यावरण और पारिस्थितिकी खंड से इन समझौतों पर आधारित प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं। यह लेख आपको UPSC Climate Agreements Summary for Prelims and Mains की पूरी जानकारी देगा, जिसमें प्रमुख वैश्विक जलवायु समझौतों का विस्तृत विश्लेषण और उनके मुख्य बिंदु शामिल हैं। हम इस लेख में जलवायु समझौतों के महत्व, उनकी संरचना, भारत की भूमिका और परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्यों को विस्तार से जानेंगे।

🎯 एक नज़र में प्रमुख जलवायु समझौते

समझौता/कन्वेंशनवर्षमुख्य उद्देश्य
पृथ्वी शिखर सम्मेलन (रियो)1992सतत विकास को बढ़ावा, UNFCCC, CBD, UNCCD की स्थापना
UNFCCC1992जलवायु परिवर्तन के खतरनाक प्रभावों को रोकने के लिए ग्रीनहाउस गैस सांद्रता को स्थिर करना
क्योटो प्रोटोकॉल1997विकसित देशों के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी उत्सर्जन कटौती लक्ष्य
पेरिस समझौता2015वैश्विक औसत तापमान वृद्धि को 2°C से काफी नीचे रखना, 1.5°C तक सीमित करने का प्रयास
मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल1987ओजोन परत को नष्ट करने वाले पदार्थों के उत्पादन और खपत को समाप्त करना

जलवायु समझौते क्या हैं और UPSC के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं? | विस्तृत जानकारी

जलवायु समझौते वैश्विक स्तर पर देशों द्वारा जलवायु परिवर्तन से निपटने और पर्यावरण संरक्षण के लिए किए गए कानूनी रूप से बाध्यकारी या गैर-बाध्यकारी करार होते हैं। इन समझौतों का उद्देश्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के अनुकूल होना, और सतत विकास को बढ़ावा देना है। UPSC परीक्षा के दृष्टिकोण से, इन समझौतों को समझना इसलिए आवश्यक है क्योंकि ये अंतरराष्ट्रीय संबंध, पर्यावरण नीति, अर्थशास्त्र और सामाजिक विकास जैसे कई विषयों से जुड़े हैं। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव और भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को देखते हुए, इन समझौतों पर आधारित प्रश्न लगातार पूछे जाते हैं।

UPSC के लिए जलवायु समझौतों का महत्व

  • प्रारंभिक परीक्षा (Prelims): समझौतों के वर्ष, उनके मुख्य प्रावधान, संबंधित निकाय, और भारत की स्थिति से संबंधित तथ्यात्मक प्रश्न।
  • मुख्य परीक्षा (Mains): समझौतों का विश्लेषण, उनकी सफलताएँ और चुनौतियाँ, भारत पर प्रभाव, और आगे की राह पर आधारित विश्लेषणात्मक प्रश्न।

प्रमुख वैश्विक जलवायु समझौते

1. पृथ्वी शिखर सम्मेलन (रियो सम्मेलन), 1992

ब्राजील के रियो डी जनेरियो में आयोजित यह शिखर सम्मेलन पर्यावरण और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCED) के नाम से जाना जाता है। इसने सतत विकास की अवधारणा को वैश्विक एजेंडे में लाया। इस सम्मेलन के परिणामस्वरूप कई महत्वपूर्ण दस्तावेज और समझौते सामने आए:

  • एजेंडा 21: सतत विकास प्राप्त करने के लिए एक कार्य योजना।
  • जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC): वैश्विक जलवायु परिवर्तन पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया की नींव।
  • जैव विविधता पर कन्वेंशन (CBD): जैव विविधता के संरक्षण, उसके घटकों के सतत उपयोग और आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग से होने वाले लाभों के उचित व समान बंटवारे के लिए।
  • मरुस्थलीकरण का मुकाबला करने के लिए संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (UNCCD): मरुस्थलीकरण और सूखे के प्रभावों से निपटना।

2. UNFCCC (संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन)

UNFCCC 1992 के रियो शिखर सम्मेलन में अपनाया गया था और 1994 में लागू हुआ। इसका अंतिम उद्देश्य "वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैस सांद्रता को एक ऐसे स्तर पर स्थिर करना है जो जलवायु प्रणाली के साथ खतरनाक मानवीय हस्तक्षेप को रोके।" UNFCCC कोई बाध्यकारी उत्सर्जन लक्ष्य निर्धारित नहीं करता है, बल्कि यह देशों को जलवायु परिवर्तन पर सूचना साझा करने, राष्ट्रीय रणनीतियों को विकसित करने और लागू करने के लिए एक रूपरेखा प्रदान करता है। इसके तहत ही वार्षिक कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज़ (COP) बैठकें आयोजित की जाती हैं।

3. क्योटो प्रोटोकॉल, 1997

जापान के क्योटो में COP3 में अपनाया गया यह प्रोटोकॉल UNFCCC के तहत एक अंतरराष्ट्रीय संधि है। यह औद्योगिक देशों और अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों (एनेक्स I पार्टियाँ) के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी लक्ष्य निर्धारित करता है। प्रोटोकॉल में कुछ लचीले तंत्र शामिल हैं:

  • स्वच्छ विकास तंत्र (Clean Development Mechanism - CDM): विकसित देशों को विकासशील देशों में उत्सर्जन-घटाने वाली परियोजनाओं में निवेश करके क्रेडिट अर्जित करने की अनुमति देता है।
  • अंतर्राष्ट्रीय उत्सर्जन व्यापार (International Emissions Trading): देशों को उत्सर्जन इकाइयां खरीदने और बेचने की अनुमति देता है।

यह प्रोटोकॉल दो प्रतिबद्धता अवधियों (2008-2012 और 2013-2020) के साथ संचालित हुआ।

4. पेरिस समझौता, 2015

COP21 में अपनाया गया पेरिस समझौता (Paris Agreement) जलवायु परिवर्तन के लिए एक महत्वपूर्ण वैश्विक प्रतिक्रिया है। इसका मुख्य उद्देश्य वैश्विक औसत तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 2°C से काफी नीचे रखना और 1.5°C तक सीमित करने के प्रयासों को जारी रखना है। इसकी प्रमुख विशेषताएं:

  • राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (Nationally Determined Contributions - NDCs): प्रत्येक देश अपनी जलवायु कार्य योजना स्वयं निर्धारित करता है, जो बाध्यकारी नहीं है, लेकिन उन्हें प्रस्तुत करना और नियमित रूप से समीक्षा करना अनिवार्य है।
  • ग्लोबल स्टॉकटेक (Global Stocktake): हर पांच साल में सामूहिक प्रगति का आकलन।
  • क्षति और हानि (Loss and Damage): जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से उत्पन्न होने वाले नुकसान और क्षति को संबोधित करने पर जोर।
  • वित्तपोषण: विकसित देशों से विकासशील देशों को जलवायु कार्रवाई के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करने का आह्वान।

💡 Pro Tip: पेरिस समझौता एक 'बॉटम-अप' दृष्टिकोण अपनाता है, जबकि क्योटो प्रोटोकॉल 'टॉप-डाउन' था।

5. मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल, 1987

यह ओजोन परत को क्षीण करने वाले पदार्थों (ODS) के उत्पादन और खपत को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय संधि है। इसे पर्यावरण समझौतों में सबसे सफल माना जाता है। 2016 में, मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल में कीगाली संशोधन (Kigali Amendment) जोड़ा गया, जिसका उद्देश्य हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFCs) को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करना है, जो शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसें हैं।

UPSC Prelims के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

  • रामसर कन्वेंशन (1971): आर्द्रभूमि के संरक्षण और स्थायी उपयोग के लिए।
  • CITE (1973): वन्य जीवों और वनस्पतियों की लुप्तप्राय प्रजातियों में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन।
  • बेसल कन्वेंशन (1989): खतरनाक अपशिष्टों की सीमा-पार आवाजाही के नियंत्रण और उनके निपटान के लिए।
  • रॉटरडैम कन्वेंशन (1998): कुछ खतरनाक रसायनों और कीटनाशकों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए।
  • स्टॉकहोम कन्वेंशन (2001): स्थायी कार्बनिक प्रदूषकों (POPs) को समाप्त करने या प्रतिबंधित करने के लिए।

UPSC Mains के लिए विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण: भारत की भूमिका और चुनौतियाँ

भारत ने वैश्विक जलवायु समझौतों में सक्रिय भूमिका निभाई है। भारत ने पेरिस समझौते को सफलतापूर्वक अनुसमर्थित किया है और अपने महत्वाकांक्षी NDC लक्ष्यों (जैसे 2030 तक गैर-जीवाश्म ऊर्जा स्रोतों से 50% बिजली उत्पादन क्षमता प्राप्त करना, कुल अनुमानित कार्बन उत्सर्जन में 1 बिलियन टन की कमी करना, और 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य) को प्राप्त करने के लिए प्रतिबद्ध है।

भारत के सामने चुनौतियाँ

  • विकास बनाम पर्यावरण: विकासशील देश होने के नाते, भारत को आर्थिक विकास और जलवायु कार्रवाई के बीच संतुलन बनाना होता है।
  • वित्तीय सहायता और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण: जलवायु कार्रवाई के लिए पर्याप्त वित्तीय और तकनीकी सहायता की आवश्यकता।
  • आपदा जोखिम में वृद्धि: भारत जलवायु परिवर्तन के प्रभावों (बाढ़, सूखा, चक्रवात) के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है।

आगे की राह

भारत को अपनी घरेलू जलवायु नीतियों को मजबूत करना, अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा देना, जलवायु-लचीली अवसंरचना का निर्माण करना और वैश्विक मंच पर अधिक न्यायसंगत जलवायु कार्रवाई के लिए दबाव डालना जारी रखना होगा।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q1: UNFCCC का मुख्य कार्य क्या है?

Answer: UNFCCC का मुख्य कार्य जलवायु परिवर्तन के खतरनाक मानवीय हस्तक्षेप को रोकने के लिए ग्रीनहाउस गैस सांद्रता को स्थिर करने के लिए एक रूपरेखा प्रदान करना है। यह स्वयं उत्सर्जन लक्ष्य निर्धारित नहीं करता।

Q2: पेरिस समझौते के प्रमुख उद्देश्य क्या हैं?

Answer: पेरिस समझौते का मुख्य उद्देश्य वैश्विक औसत तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 2°C से काफी नीचे रखना और 1.5°C तक सीमित करने के प्रयासों को जारी रखना है।

Q3: क्योटो प्रोटोकॉल और पेरिस समझौते के बीच क्या अंतर है?

Answer: क्योटो प्रोटोकॉल विकसित देशों के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी उत्सर्जन लक्ष्य निर्धारित करता था ('टॉप-डाउन'), जबकि पेरिस समझौता देशों को अपने स्वयं के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) प्रस्तुत करने की अनुमति देता है जो बाध्यकारी नहीं हैं ('बॉटम-अप')।

Q4: भारत कीगाली संशोधन का हिस्सा है या नहीं?

Answer: हां, भारत ने मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के कीगाली संशोधन का अनुसमर्थन किया है, जिसका उद्देश्य हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFCs) को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करना है।

Q5: COP (Conference of Parties) क्या है?

Answer: COP UNFCCC का सर्वोच्च निर्णय लेने वाला निकाय है, जहां सदस्य देश जलवायु परिवर्तन से संबंधित नीतियों और समझौतों की समीक्षा और वार्ता करते हैं।

Q6: स्वच्छ विकास तंत्र (CDM) क्या है?

Answer: CDM क्योटो प्रोटोकॉल के तहत एक तंत्र था जिसने विकसित देशों को विकासशील देशों में उत्सर्जन-घटाने वाली परियोजनाओं में निवेश करके क्रेडिट अर्जित करने की अनुमति दी।

निष्कर्ष

UPSC Climate Agreements Summary for Prelims and Mains के तहत, हमने विभिन्न वैश्विक जलवायु समझौतों के महत्वपूर्ण पहलुओं को कवर किया है। इन समझौतों को गहराई से समझना यूपीएससी परीक्षा में सफलता के लिए महत्वपूर्ण है। हमें उम्मीद है कि यह विस्तृत जानकारी आपको अपनी तैयारी में मदद करेगी और आपको जलवायु परिवर्तन से संबंधित विषयों पर एक मजबूत पकड़ बनाने में सक्षम बनाएगी।

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इसके अलावा, आप UPSC पर्यावरण और पारिस्थितिकी नोट्स और भारत पर ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव भी पढ़ सकते हैं।अधिक जानकारी के लिए आधिकारिक UNFCCC पोर्टल पर जाएं।

UPSC Climate Agreements Summary for Prelims and Mains – ताज़ा अपडेट

संक्षेप में: UPSC Climate Agreements Summary for Prelims and Mains से जुड़े महत्वपूर्ण बिंदु ऊपर दिए गए हैं।

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